"राजनीति ने अटलजी की काव्य रसधारा को भले अवरूद्ध किया हो लेकिन काव्य ने उनकी
राजनीति को बड़ी गहरी संवेदना से सँवारा है। दोनों के समन्वय को देखने-परखने की
उनकी दृष्टि बिल्कुल साफ है। इतना ही नहीं, वे साहित्य को अधिनायकवादियों तक पर
अंकुश का एक कारगर ज़रिया मानते है। उन्होंने कहा हैः "साहित्य ओर राजनीति के कोई
अलग-अलग खाने नहीं हैं।॰॰॰ जब कोई साहित्यकार राजनीति करेगा तो वह अधिक परिष्कृत
होगी। कहीं कोई कवि यदि डिक्टेटर बन जाए तो वह निर्देषों के खून से अपने हाथ नहीं
रँगेगा।"